कोरबा एक्सक्लूसिव | दर्री डेम में जलकुंभी का ‘हरित जाल’ या सफाई के नाम पर बड़ा सिस्टम गेम?
दर्री डेम पर जलकुंभी का कब्जा, पानी नहीं अब ‘हरित चादर’

KORBA: कोरबा जिले के प्रमुख जल स्रोत दर्री डेम की हालत अब गंभीर सवालों के घेरे में है। डेम की जल सतह पर जलकुंभी ने इस कदर कब्जा जमा लिया है कि दूर से पूरा जल क्षेत्र किसी हरे मैदान जैसा दिखाई देता है, लेकिन हकीकत में यह पानी के दम घुटने की कहानी बन चुका है। स्थानीय अनुमान के मुताबिक 60–70% जलक्षेत्र पर जलकुंभी की मोटी परत फैली हुई है।ऑक्सीजन खत्म, मछलियां संकट में—प्राकृतिक सिस्टम चरमराया
जलकुंभी की परत पानी के अंदर सूरज की रोशनी को रोक रही है, जिससे ऑक्सीजन स्तर लगातार गिर रहा है। इसका सीधा असर मछलियों और जलीय जीवों पर पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई हिस्सों में मछलियों की संख्या घटती जा रही है और पूरा जल-तंत्र असंतुलित हो रहा है। यह सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि जल जीवन पर सीधा हमला बनती जा रही है।

पावर प्लांट तक पहुंचा खतरा, पहले भी हो चुका नुकसान
सूत्रों के अनुसार पूर्व में यही जलकुंभी जल प्रवाह के साथ बहकर पावर प्लांट तक पहुंच चुकी है, जिससे उत्पादन बाधित हुआ और यूनिट तक बंद करनी पड़ी थी। करोड़ों के नुकसान के बाद भी आज तक स्थायी समाधान नहीं निकलना, सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने खड़ा है।

सफाई नहीं, ‘फाइलों में सफाई’ का खेल?
सबसे बड़ा विवाद जलकुंभी उन्मूलन कार्य को लेकर है। आरोप हैं कि गर्मी के मौसम में वास्तविक सफाई लगभग न के बराबर होती है, जबकि बारिश के समय गेट खोलकर जलकुंभी को बहा दिया जाता है। इसके बाद आंशिक सफाई दिखाकर लाखों रुपये के बिल पास कर दिए जाते हैं। स्थानीय स्तर पर इसे “सफाई नहीं, सिस्टम की सेटिंग” बताया जा रहा है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

जिम्मेदार कौन? विभागीय चुप्पी पर सवाल
दर्री बराज और जल प्रबंधन की जिम्मेदारी जल संसाधन विभाग के अंतर्गत कार्यरत हसदेव बराज जल प्रबंध उप संभाग दर्री पर मानी जाती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं कि जब समस्या हर साल दोहराई जाती है, तो स्थायी समाधान क्यों नहीं तैयार किया गया? वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रण की जगह केवल अस्थायी कार्रवाई क्यों चल रही है?
जहां करोड़ों खर्च, वहां नतीजा शून्य—क्यों नहीं दिख रहा विजन?
जलकुंभी नियंत्रण पर हर साल खर्च होने वाले बजट के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर यही संसाधन वैज्ञानिक उपयोग में लगाए जाएं तो इससे जैविक खाद, बायोगैस और हस्तशिल्प जैसे रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं, लेकिन यहां न नीति है, न योजना और न ही कोई विजन।
हर साल वही कहानी, लेकिन जिम्मेदारी तय नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जलकुंभी हर साल लौटकर आती है, सिस्टम हर साल बजट खर्च करता है, लेकिन न तो स्थायी समाधान निकलता है और न ही किसी की जिम्मेदारी तय होती है। यह स्थिति सीधे तौर पर प्रशासनिक उदासीनता और प्रबंधन की विफलता को उजागर करती है। स्थानीय लोग अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि यह समस्या आखिर कब तक कागजों में दबाई जाती रहेगी। मांग है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हो, खर्च की ऑडिटिंग की जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।जलकुंभी नहीं, सिस्टम की जकड़न सबसे बड़ा संकट
दर्री डेम में जलकुंभी का फैलाव अब सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल है। अगर अब भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संकट आने वाले समय में और बड़ा नुकसान लेकर सामने आएगा।









